पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान पर आधारित पोषण समाधान या उपाय सितंबर 2020 में मनाए जा रहे पोषण माह का अभिन्न हिस्सा होंगे। इससे पोषण अभियान के तहत विभिन्न गतिविधियों में नई तेजी आएगी। इसके साथ ही इस दौरान कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करने पर भी फोकस किया जाएगा।
अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन) दरअसल समग्र पोषण के लिए प्रधानमंत्री की व्यापक योजना है, जिसका शुभारंभ उन्होंने 8 मार्च, 2018 को किया था। इस कार्यक्रम में बच्चों का कद न बढ़ने, अल्प-पोषण और जन्म के समय वजन कम रहने की समस्या में कमी लाने और किशोर लड़कियों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं एवं बच्चों में एनीमिया (रक्त की कमी) की समस्या को कम करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। भारत की सभी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भोजन एवं आहार पर विशेष जोर दिया जाता है, और इनमें इस विषय पर परिष्कृत या अत्याधुनिक जानकारियां रहती हैं। पोषण अभियान को नई गति देने के लिए समय की कसौटी पर खरे उतरे इस ज्ञान के भंडार को वैज्ञानिक रूप से अनुकूलित किया जाएगा। पोषण अभियान में आयुष-आधारित समाधानों या उपायों के लिए निर्दिष्ट भूमिका का उल्लेख स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिवों द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को 7 सितंबर, 2020 को भेजे गए संयुक्त पत्र में किया गया था।
का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गंभीर तीव्र कुपोषण (एसएएम) से पीड़ित बच्चों की जल्द पहचान करना है। यह शीघ्र पहचान समय पर उपचार शुरू करने और जटिलताओं के जोखिम को कम करने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अत: इस वर्ष राष्ट्रीय पोषण माह के दौरान ‘एसएएम’ से पीडि़त बच्चों की पहचान और उपचार करने के लिए एक अभियान चलाया जाएगा।
आयुर्वेद, सिद्ध एवं यूनानी जैसी स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियों के विशेषज्ञों को अच्छे पोषण, पूरक आहार इत्यादि के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए चुना जाएगा।
आयुष मंत्रालय अपने स्वायत्त निकायों के नेटवर्क के साथ-साथ आयुष शैक्षणिक संस्थानों जैसे हितधारकों के माध्यम से इसके लिए विशेष उपायों की शुरुआत और समन्वय करेगा। मंत्रालय
इस अभियान हेतु सामुदायिक सहयोग को मजबूती प्रदान करने के लिए
सौजन्य से: pib.gov.in
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